निजीकरण के विरोध में अधिवक्ताओं का प्रदर्शन लगातार चौथे दिन भी रहा जारी।

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# उप निबंधन कार्यालय पर जड़ा ताला।

# अधिवक्ताओं ने बताया आदेश को जनविरोधी।

गोरखपुर – सहजनवां !

रजिस्ट्री विभाग के निजीकरण और उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता 2006 की धारा-34 के तहत ऑनलाइन आपत्ति व निस्तारण के शासनादेश के खिलाफ सहजनवां तहसील के अधिवक्ताओं एवं दस्तावेज लेखकों का आंदोलन चौथे दिन भी पूरे जोश के साथ जारी रहा। आक्रोशित अधिवक्ताओं ने तहसील भवन के द्बितीय तल स्थित उप निबंधन कार्यालय का मुख्य द्वार बंद कर दिया और जोरदार नारेबाजी करते हुए आदेश को तत्काल वापस लेने की मांग की। विरोध के चलते कार्यालय में ताला जड़ दिया गया, जिससे रजिस्ट्री से जुड़े सभी न्यायिक एवं प्रशासनिक कार्य पूरी तरह ठप हो गए।

अधिवक्ताओं ने आरोप लगाया कि विकास का दम भरने वाली सरकार जनता की आवाज सुनने को तैयार नहीं है। उनका कहना है कि यह आदेश आम नागरिकों को त्वरित न्याय से वंचित करने और शिक्षित युवाओं को बेरोजगारी की ओर धकेलने वाला है। इसे भाजपा सरकार की सुनियोजित नीति बताते हुए उन्होंने इसे तत्काल वापस लेने की मांग की।

बार एसोसिएशन अध्यक्ष कृष्ण कुमार त्रिपाठी एडवोकेट ने कहा कि रजिस्ट्री विभाग का निजीकरण होने से न केवल हजारों अधिवक्ता और दस्तावेज लेखक बेरोजगार हो जाएंगे, बल्कि आम जनता को भी भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा। निजी हाथों में व्यवस्था जाने से पारदर्शिता और जवाबदेही समाप्त हो जाएगी, जिससे भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलेगा।मंत्री राघवेंद्र सिंह एडवोकेट ने ऑनलाइन आपत्ति और निस्तारण की व्यवस्था को अव्यावहारिक, असंवैधानिक और जनहित के प्रतिकूल बताया। उन्होंने कहा कि ग्रामीण अंचलों में आज भी इंटरनेट कनेक्टिविटी और तकनीकी जागरूकता का अभाव है। ऐसे में केवल ऑनलाइन प्रक्रिया लागू करना गरीब, अशिक्षित और वंचित वर्ग को न्याय से दूर करने जैसा होगा।अधिवक्ताओं ने मुख्यमंत्री से निजीकरण के प्रस्ताव को अविलंब निरस्त करने की पुरजोर अपील की है। साथ ही चेतावनी दी कि यदि जनभावनाओं का सम्मान करते हुए आदेश वापस नहीं लिया गया तो आंदोलन को और अधिक व्यापक व उग्र किया जाएगा। इस मुद्दे को लेकर अधिवक्ता समाज के साथ-साथ आम जनता में भी गहरा रोष व्याप्त है।

विरोध प्रदर्शन में यशवंत भारती, सतीश कन्नौजिया, अभिषेक कुमार त्रिपाठी, पूर्व मंत्री अनिल त्रिपाठी, एडवोकेट सुरेश चंद, सत्यवीर समेत बड़ी संख्या में अधिवक्ता और दस्तावेज लेखक उपस्थित रहे। सभी ने एक स्वर में कहा कि न्याय प्रक्रिया को सरल, सुगम और जनसुलभ बनाया जाना चाहिए, न कि उसे जटिल बनाकर आम आदमी की पहुंच से दूर किया जाए।

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