बहराइच- वर्ष 2030 तक रेबीज़ से ‘शून्य मृत्यु’ का लक्ष्य।

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वर्ष 2030 तक रेबीज़ से ‘शून्य मृत्यु’ का लक्ष्य।

सीएमओ सभागार में स्वास्थ्यकर्मियों का रिफ्रेशर प्रशिक्षण।

पीएचसी स्तर तक निःशुल्क उपलब्ध है एंटी रेबीज़ उपचार।

रिपोर्ट –  दिलशाद अहमद

आज का भारत लाइव

बहराइच, 11 जनवरी।

रेबीज़ से होने वाली मौतों को वर्ष 2030 तक पूरी तरह समाप्त करने के लक्ष्य की दिशा में उत्तर प्रदेश सरकार लगातार ठोस कदम उठा रही है। इसी क्रम में मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. संजय कुमार की अध्यक्षता में सीएमओ सभागार में जिले के मेडिकल कॉलेज, ट्रॉमा सेंटर, सभी सीएचसी एवं पीएचसी पर तैनात डॉक्टरों, फार्मासिस्टों तथा स्टाफ नर्सों का रिफ्रेशर प्रशिक्षण आयोजित किया गया। एसीएमओ डॉ. संतोष राना ने बताया कि नए वर्ष के साथ राज्य सरकार द्वारा सीएचसी व पीएचसी स्तर तक एंटी रेबीज़ सीरम एवं रेबीज़ रोग प्रतिरोधी ग्लोब्युलिन की उपलब्धता सुनिश्चित कर दी गई है। अब यह संपूर्ण उपचार पीएचसी व सीएचसी स्तर तक पूरी तरह निःशुल्क प्रदान किया जा रहा है।

प्रशिक्षक एवं जिला एपिडेमियोलॉजिस्ट डॉ. निर्मेष श्रीवास्तव ने बताया कि चिकित्सक घाव को श्रेणीदृ3 घोषित करते हैं अथवा जंगली जानवर द्वारा काटने की स्थिति होती है, तो पहले ही दिन एंटी रेबीज़ सीरम एवं एंटी रेबीज़ टीका लगाए जाने से रेबीज़ से मृत्यु का खतरा लगभग शतदृप्रतिशत समाप्त हो जाता है। इसके लिए जानवर के काटने के बाद उसी दिन उपचार प्रारंभ करना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने बताया कि किसी भी जानवर के काटने के तुरंत बाद घाव को नल के बहते साफ पानी से 10 से 15 मिनट तक धोना चाहिए। इसके बाद बेटाडाइन या सोफ्रामाइसिन जैसी एंटीसेप्टिक क्रीम लगानी चाहिए। घाव पर मिर्च, हल्दी, चूना, मिट्टी या अन्य घरेलू पदार्थ लगाना अत्यंत घातक होता है, क्योंकि इससे संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है और वायरस तेजी से शरीर में फैल सकता है। घाव पर पट्टी भी नहीं बाँधनी चाहिए और बिना विलंब नज़दीकी स्वास्थ्य इकाई पर पहुँचकर चिकित्सकीय सहायता लेनी चाहिए। समय पर किया गया उपचार जीवनरक्षक सिद्ध होता है। उन्होंने बताया कि किसी दुधारू जानवर को कुत्ते ने काट लिया हो, तो उसके दूध के सेवन से रेबीज़ होने की कोई संभावना नहीं होती, इसलिए इस संबंध में फैलने वाले भ्रम और डर से बचना चाहिए।

प्रशिक्षक एवं फार्मासिस्ट विंध्याचल द्विवेदी ने बताया कि रेबीज़ से बचाव के लिए घाव को यथासंभव खुला रखना आवश्यक होता है, इसलिए सामान्य परिस्थितियों में ऐसे घावों पर टांका नहीं लगाया जाता। यदि किसी विशेष चिकित्सकीय स्थिति में टांका आवश्यक हो, तो यह केवल एंटी रेबीज़ उपचार शुरू होने के बाद और डॉक्टर की सलाह पर ही किया जाता है। प्रशिक्षण कार्यक्रम के अन्त में मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. संजय कुमार ने आम जनमानस से अपील की कि किसी भी जानवर के काटने की स्थिति में घरेलू उपचार न करें और तुरंत नज़दीकी स्वास्थ्य केंद्र पर पहुँचें। अब पीएचसी स्तर तक निःशुल्क एंटी रेबीज़ उपचार उपलब्ध है, जिसका लाभ लेकर जान बचाई जा सकती है।

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